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गर्दिशे आलम
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| तिफ्ल की आग |
दिन ढलते नहीं, रातें गुज़रती नहीं.
मन में जो बातें है, मन्न से उतरती नहीं |
यादें भी अब, याद रखें ही क्यूं ?
जब लोगों से दोस्ती तक तो संवरती नहीं |
इंतहा हो गई, गुमशुदाई घटती नहीं,
लगता था कि मंज़िल है मौत,
मगर ये तो रोज़ चली आती है,
किस्मत देखो साली क्या दिन दिखाती है|
बेखयाली और बेवफाई के ज़माने में,
बेपरवाह फिरना, ऐसी बेवकूफी चलती नहीं,
इंतज़ार करते रह गए वक्त बदलने का,
ये बेचैनी अब हमसे संभलती नहीं|
बिन बोले बयान ये मेरा ख्वाब हो,
दास्तां मेरी अब जल्द तमाम हो !
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